नई दिल्ली / अन्नपूर्णा देवी, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री
बाल विवाह हमारे देश की सामाजिक संरचना में सदियों से रची-बसी एक ऐसी कुप्रथा रही है, जिसने लाखों मासूम बचपन को समय से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया। यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय या पारिवारिक परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चुनौती है जो बालिकाओं और बालकों के मौलिक अधिकारों, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास को सीधे प्रभावित करती है। ऐसे समय में इस समस्या से मुक्ति केवल नीति आधारित कदम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प की तरह उभरकर सामने आई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ‘संपूर्ण सरकार और संपूर्ण समाज’ की सहभागिता से इस दिशा में ठोस पहल करनी शुरू की है। इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह जिम्मेदारी केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे समाज, परिवार, पंचायत, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं, प्रशासन और नीति निर्धारकों के बीच साझा करता है। बाल विवाह मुक्त भारत अभियान की शुरुआत ने इस सोच को और पुख्ता करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि 2030 तक इस कुप्रथा को समाप्त करना हमारा सामूहिक लक्ष्य है।
सरकार द्वारा लागू पोषण, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं, आंगनबाड़ी केंद्रों के सशक्तीकरण, पोषण ट्रैकर, समग्र शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति कार्यक्रम और कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से बाल विवाह के मूल कारकों — गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता और जागरुकता की कमी — को खत्म करने की जमीन तैयार कर रही हैं। यह पहली बार संभव हुआ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रशासनिक नेटवर्क कमजोर परिवारों और बच्चों तक पहुँचने का एक सशक्त माध्यम बनकर काम कर रहे हैं।
इस मुहिम में बाल विवाह निषेध अधिकारियों (सीएमपीओ) की नियुक्ति, पंचायत स्तर पर बाल संरक्षण कानूनों का प्रशिक्षण, स्कूल से बाहर किशोरियों की पहचान और उन्हें पुनः दाखिला दिलाने जैसी क्रियाएं समाज में बदलाव की बुनियाद बन रही हैं। तकनीक आधारित ‘बाल विवाह मुक्त भारत पोर्टल’ ने शिकायत दर्ज कराने, केस ट्रैक करने और जागरूकता बढ़ाने की प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बना दिया है। यह पोर्टल न केवल प्रशासन और नागरिकों के बीच संवाद का ज़रिया है, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक भी है।
बाल विवाह के खिलाफ यह सामूहिक लड़ाई आज निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। भारत दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि शासन और समाज जब एक ही लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हों, तो कोई भी सामाजिक बुराई अजेय नहीं रह सकती। यह अभियान हमारी अगली पीढ़ी के बचपन, उनके सपनों और उनके संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। ये बच्चे ही विकसित भारत के वास्तविक ‘सारथी’ हैं, और उनके उज्ज्वल भविष्य को बचाने के लिए उठाए गए ये कदम ही देश की सच्ची प्रगति का प्रमाण हैं।