वेब वार्ता (न्यूज एजेंसी)/ अजय कुमार वर्मा
वाराणसी। प्रति वर्स की भांति कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर यानि देव दीपावली पर काशी अपने अलौकिक सौंदर्य से जगमगा रहा है। यहां के घाटों की छटा ही निराली है। 84 घाटों पर 17 लाख से अधिक दीयों की जगमगाहट में गंगा मैया का श्रृंगार किया जाएगा। इस दिव्यता का उत्साहमय माहौल देशभर से आए लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है। काशी के बबुआ पांडेय घाट पर 51 हजार दीपों से लिखा जाएगा बंटोगे तो कटोगे। इस बार घाटों पर सजाए जाने वाले दीये महिला सशक्तिकरण को समर्पित होंगे और काशी के घाटों पर दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा को श्रद्धांजलि भी दी जाएगी। इसके अलावा गंगा द्वार और चेत सिंह घाट पर लेजर शो और आतिशबाजी का भी आयोजन किया जाएगा। दशाश्वमेध घाट पर विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती के लिए भी व्यापक इंतजाम किए गए हैं।
बताते चलें कि बनारस में हर साल मनाए जाने वाले देव दीपावली महोत्सव में हजारों दीप गंगा के घाटों पर जलाए जाते हैं। शहर के आम लोग इस पर्व को बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं। देव दीपावली का आरंभ पंचगंगा घाट से हुआ, जहाँ एक साधारण दीपोत्सव धीरे-धीरे अद्वितीय महोत्सव में बदल गया। 1985 में मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने देव दीपावली को भव्य स्वरूप देने का संकल्प लिया। बाढ़ के बाद घाटों की सफाई और सौंदर्यीकरण के लिए दीपोत्सव का विचार आया। शुरुआत में उन्होंने पंचगंगा घाट समेत कुछ घाटों पर दीये जलाने का कार्य किया और जनता से तेल और घी का योगदान लिया गया। धीरे-धीरे यह आयोजन छह घाटों से होते हुए अन्य प्रमुख घाटों तक विस्तारित हो गया।
वर्ष 1990 तक इस परंपरा ने 30 घाटों को अपने दायरे में ले लिया। बाद में, नारायण गुरु की अगुवाई में सभी घाटों को रोशन करने के लिए केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ। एक दशक में ही यह उत्सव आज की देव दीपावली की भव्यता में परिवर्तित हो गया, जहाँ हर घाट पर श्रद्धा और आस्था के दीये मानो काशी को स्वर्ग का प्रतिबिंब बना देते हैं।