वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ द्वारा संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के तत्वावधान में तथा स्वामी विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी, मेरठ के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “पालि: भारत की शास्त्रीय भाषा – एशिया की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करना तथा पालि को वैश्विक विरासत भाषा के रूप में स्थापित करने में भारत की भूमिका” का 29 जनवरी 2026 को भव्य एवं ऐतिहासिक समापन हुआ।
28-29 जनवरी को आयोजित इस सम्मेलन में भारत सहित कोरिया, थाईलैंड, वियतनाम, म्यांमार, श्रीलंका, यूके, नीदरलैंड्स, भूटान और नेपाल से आए विद्वानों, बौद्ध भिक्षुओं, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सहभागिता की। सम्मेलन का उद्देश्य पालि भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के बाद उसके शैक्षणिक, सांस्कृतिक और वैश्विक महत्व पर गहन विमर्श करना था।
विभिन्न सत्रों में कुल 97 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें पालि भाषा, बौद्ध दर्शन, त्रिपिटक परंपरा, बौद्ध संस्कृति और वैश्विक संदर्भ में बुद्ध के उपदेशों की प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। समापन सत्र की अध्यक्षता श्री तरुणेश बौद्ध ने की। उन्होंने पालि को भारत की करुणामयी और नैतिक चेतना की जीवंत संवाहिका बताया।
मुख्य अतिथि पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने वीडियो संदेश में कहा कि पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलना भारत की बौद्धिक विरासत के संरक्षण की ऐतिहासिक उपलब्धि है। सम्मेलन में पालि एवं बौद्ध अध्ययन के संवर्धन हेतु महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ भी प्रस्तुत की गईं। सम्मेलन का समापन पालि को वैश्विक विरासत भाषा के रूप में स्थापित करने के संकल्प के साथ हुआ।