वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की नियमावली पर रोक लगाया जाना एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय है। यह मामला केवल शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर समानता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमदृष्टया यह माना कि यूजीसी के ये प्रावधान अस्पष्ट हैं। किसी भी कानून या नियम की सबसे बड़ी शर्त उसकी स्पष्टता होती है, ताकि उसके दायरे और प्रभाव को समझा जा सके। अस्पष्ट नियम न केवल भ्रम पैदा करते हैं, बल्कि उनके दुरुपयोग की भी पूरी संभावना रहती है। अदालत ने इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए इस नियमावली पर रोक लगाई है।
न्यायालय का यह भी कहना है कि यह नियम अनुच्छेद 14, यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। संविधान का यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। यदि कोई नियम कुछ वर्गों के साथ भेदभाव करता है या मनमाने ढंग से लागू किया जा सकता है, तो वह संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
यूजीसी जैसी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा की गुणवत्ता और स्वतंत्रता दोनों की रक्षा करे। ऐसे में ऐसे नियम, जो अकादमिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाते हों या चयनात्मक कार्रवाई का रास्ता खोलते हों, लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप न केवल संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम है, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि शिक्षा और कानून दोनों में पारदर्शिता और समानता अनिवार्य है।