वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
सहारनपुर। सहारनपुर में देवबंदी उलेमा और जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक कारी इसहाक गोरा के बयान ने समुदाय के भीतर गहरे आत्मचिंतन की बहस तेज़ कर दी है। संविधान दिवस और सामाजिक हालात के संदर्भ में दिए गए अपने हालिया वक्तव्य में उन्होंने कहा कि मुसलमान अपनी मौजूदा परेशानियों, बदसुकूनी और बरकत के खत्म होने के लिए काफ़ी हद तक खुद जिम्मेदार हैं। उनके अनुसार, बिगड़ते हालात की असल वजह बाहर से ज्यादा भीतर—घर और समाज के रोज़मर्रा जीवन में पैदा हो रही नाफरमानी और शोर–शराबे की संस्कृति में निहित है।
कारी इसहाक गोरा ने चिंता व्यक्त की कि मुसलमानों के घरों से कुरआन की तिलावत और अल्लाह के जिक्र का माहौल धीरे–धीरे समाप्त होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर कभी तिलावत, दुआ और रूहानी सुकून की गूंज होती थी, अब वहां म्यूज़िक, नाच–गाना और बेतहाशा आतिशबाजी ने जगह बना ली है। यह बदलाव अल्लाह की रहमत को दूर कर देने का प्रमुख कारण है। उन्होंने शादियों, धार्मिक व सामाजिक आयोजनों में बढ़ते बैंड–बाजा, डीजे, तेज़ संगीत, आतिशबाजी और फिजूल रस्मों पर सख़्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह न केवल फिजूलखर्ची और दिखावा है, बल्कि सड़क पर गुजरने वालों, बीमारों, बच्चों और पक्षियों तक के लिए पीड़ा का सबब भी बनता है। कारी साहब का यह भी कहना था कि जब घरों का वातावरण ही अल्लाह की अवज्ञा से भर जाए, तो रहमत और सुकून की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्होंने समुदाय से अपील की कि अपनी परेशानियों का दोष बाहर खोजने से पहले मुसलमान आत्ममंथन की राह अपनाएं। घरों और समाज से नाच–गाना, अनावश्यक शोर, फिजूल रस्में और दिखावटी परंपराएं हटाकर रूहानी वातावरण को पुनर्स्थापित करना होगा। उन्होंने कहा कि इस्लाह की शुरुआत दिल और घर से होती है, और जब कौम बदलने का प्रयास करती है, तो अल्लाह उसकी तकदीर भी बदल देता है।
सोशल मीडिया पर यह बयान तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिस पर समर्थन और आलोचना—दोनों स्वर उभर रहे हैं। इसे समय की कड़ी चेतावनी और समाज के भीतर सुधार की पुकार के रूप में देखा जा रहा है।