वेब वार्ता (न्यूज एजेंसी)/ अजय कुमार
गोरखपुर। विरासत गलियारा परियोजना में गोरखपुर में पांडेयहाता से धर्मशाला ओवरब्रिज तक एक साढ़े तीन किलोमीटर लंबा गलियारा बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सिर्फ सड़क चैड़ीकरण नहीं, बल्कि इलाके की ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करना और सुंदर बनाना भी है।
समस्या यह है कि गलियारे की जद में 833 मकान आ रहे हैं, जिनमें से 200 से ज्यादा मकान जमींदारों की जमीन पर बने हैं, लेकिन उनके पास कोई वैध मालिकाना कागज नहीं है। मकान मालिक पीढ़ियों से रह रहे हैं, नगर निगम को गृहकर और जलकर भी दे रहे हैं, लेकिन जमीन के अधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं।
मामले की कानूनी पृष्ठभूमि यह कहती है कि 1952 में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हुआ, जिससे खेतों का मालिकाना हक किसानों को मिल गया। लेकिन जिन जमीनों पर मकान बने थे, वे अक्सर न तो चकबंदी में शामिल हुईं, न ही उनका मालिकाना हक तय हो पाया। सरकार उन्हीं लोगों को मुआवजा दे सकती है, जिनके पास जमीन के वैध कागजात हों। लेकिन जिन लोगों के नाम जमीन में दर्ज नहीं हैं, उन्हें मुआवजा नहीं मिल पा रहा, भले ही वे सदियों से वहां रह रहे हों।
प्रशासन अब दो विकल्पों पर विचार कर रहा है, पहला कब्जे के अधिकार के आधार पर मुआवजा अर्थात जिन लोगों का कब्जा निर्विवाद है और जो वर्षों से रह रहे हैं, उन्हें मुआवजा दिया जा सकता है। दूसरा स्थानीय स्तर पर सत्यापन जिसमें राजस्व विभाग और नगर निगम मिलकर स्थानीय रिपोर्ट के आधार पर पुख्ता कब्जा प्रमाणित कर सकते हैं।
बताया जाता है कि शुरुआत में लोग परियोजना को लेकर उत्साहित थे। लेकिन जब पता चला कि सड़क की चैड़ाई 21 मीटर होगी और उनके मकान टूट सकते हैं, तो विरोध हुआ। सीएम के हस्तक्षेप के बाद चैड़ाई घटाकर 12.5 मीटर की गई, लेकिन मुआवजे का मुद्दा अब भी उलझा हुआ है। कागज नहीं है, लेकिन पुश्तैनी कब्जा है। यही इस विवाद का केंद्रबिंदु है।