– मृत मछलियों को गोमती में प्रवाहित किए जाने की घटना ने मंत्री के दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया.
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी )/ अजय कुमार
लखनऊ. लखनऊ में गोमती नदी किनारे मछली प्रवाह कार्यक्रम के दौरान एक विवाद खड़ा हो गया, जब यह सामने आया कि जिन प्लास्टिक पैकेटों से मछलियां नदी में छोड़ी जा रही थीं, उनमें से बड़ी संख्या पहले से ही मृत थी। लक्ष्मण झूला पार्क में आयोजित इस कार्यक्रम में मत्स्य मंत्री संजय निषाद, प्रमुख सचिव मुकेश मिश्राम और विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच सजा रहा, मीडिया मौजूद रही और मंत्री ने किनारे के साथ-साथ नाव में बैठकर भी मछलियां छोड़ते हुए फोटोशूट कराया। लेकिन कार्यक्रम की चमक तब फीकी पड़ गई, जब लोगों ने देखा कि पानी में छोड़ी गई कई मछलियां तुरंत ही नीचे चली गईं और बिल्कुल नहीं हिलीं, जिससे साफ हो गया कि वे पहले से ही मर चुकी थीं।
मौके पर मौजूद स्थानीय लोगों के साथ-साथ मछुआरों ने भी इस अव्यवस्था पर तीखी प्रतिक्रिया दी। मछुआरों ने बताया कि प्लास्टिक पैकेटों में भरी मछलियों की हालत अक्सर पहले से ही खराब होती है। उनके अनुसार करीब 10 प्रतिशत मछलियां पैकेट के भीतर ही मर जाती हैं। इसके अलावा, नदी में पहुंचने के बाद लगभग 50 प्रतिशत मछलियां गंदे पानी के कारण कारण मर जाती हैं। उनका कहना है कि कुल मिलाकर मुश्किल से थोड़ी ही मछलियां ही जीवित रह पाती हैं,
अब इन हालात में ऐसे भव्य कार्यक्रमों की वास्तविक उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। विभागीय टीमें पूरे कार्यक्रम में व्यस्त रहीं, लेकिन किसी ने भी पैकेटों की गुणवत्ता या मछलियों की स्थिति की जांच करने की जरूरत नहीं समझी।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री संजय निषाद ने दावा किया कि पहले नदियों में मछलियों की मृत्यु दर लगभग 30 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। मछुआरा समाज के उत्थान के लिए मंत्री ने कई दावे किए और इस तरह के कार्यक्रम उसी दिशा में एक प्रयास हैं। हालांकि, मृत मछलियों को ही गोमती में प्रवाहित किए जाने की घटना ने मंत्री के दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। इस पूरे प्रकरण के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या ऐसे कार्यक्रम वास्तविक रूप से नदी में मत्स्य वृद्धि में मदद करते हैं या केवल प्रचार तक सीमित रह जाते हैं।