वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। लखनऊ नगर निगम में हर साल करीब 500 करोड़ रुपये के काम ई-टेंडर के बिना कराए जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के बजाय मैनुअल टेंडर के जरिए काम कराने से टेंडर पूलिंग को बढ़ावा मिल रहा है। इससे निगम को संभावित वित्तीय नुकसान होने की भी चर्चा है। दावा है कि यदि इन कार्यों के ई-टेंडर कराए जाएं तो सालाना करीब 40 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
शासन की व्यवस्था के अनुसार विकास कार्यों में पारदर्शिता के लिए ई-टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। हालांकि नगर निगम में पार्षद कोटा और नगर निगम निधि के कई कार्य मैनुअल टेंडर से कराए जा रहे हैं। कानूनी अड़चनों से बचने के लिए सदन ने 10 लाख रुपये से कम लागत वाले कार्यों के लिए मैनुअल टेंडर का प्रस्ताव पारित किया है। आरोप है कि 10 लाख रुपये से अधिक के कार्यों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग फाइलों के जरिए मैनुअल टेंडर कराए जाते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, वार्ड विकास निधि से इस वर्ष करीब 300 करोड़ रुपये के कार्य होने हैं। 15वें वित्त आयोग और अवस्थापना बजट के कार्यों में ठेकेदार 15 से 40 प्रतिशत तक कम दर पर टेंडर डालते हैं, जबकि पार्षद कोटे के मैनुअल टेंडर में प्रतिस्पर्धा अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।यह भी आरोप है कि कई वार्डों में लंबे समय से कुछ ठेकेदारों को ही काम मिल रहा है। बाहरी ठेकेदारों के टेंडर विभिन्न कारणों से निरस्त होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। इसके अलावा 50 से अधिक वार्डों में सफाई का काम कार्यदायी संस्थाओं के माध्यम से कराया जा रहा है। करीब 200 करोड़ रुपये के इन कार्यों में भी ई-टेंडर नहीं होने का दावा है।
महापौर सुषमा खर्कवाल से इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने नगर आयुक्त से बात करने को कहा। नगर आयुक्त से संपर्क नहीं हो सका।