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वंदे मातरम् का विरोध औपनिवेशिक मानसिकता का अवशेष: विहिप

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा है कि मजहबी आधार पर वंदे मातरम् का विरोध करने वाले लोग देश विरोधी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह वही अलगाववादी सोच है, जिसने भारत के सांप्रदायिक विभाजन को जन्म दिया था और आज इसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। डॉ. जैन के अनुसार राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रति पूरा देश कृतज्ञ है, क्योंकि डेढ़ सौ वर्षों से वंदे मातरम् राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख आधार रहा है। बंग भंग आंदोलन के दौरान भी यही उद्घोष पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला बना था।
उन्होंने कहा कि अंग्रेज इस आंदोलन की सफलता से चिंतित थे और उन्होंने हिंदू-मुस्लिम भेदभाव पैदा करने के लिए ऐसे मुस्लिम नेताओं को सामने लाया, जो उनके सुर में सुर मिला सकें। 1907 में वंदे मातरम् पर लगे प्रतिबंध के बाद 1908 में कांग्रेस के भीतर पहली बार कुछ मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध शुरू किया, जबकि उससे पहले वे इसे गाने में संकोच नहीं करते थे। डॉ. जैन के अनुसार तुष्टिकरण के दबाव में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने भी मां भारती को समर्पित इस गीत को विभाजित कर दिया, जिसके बाद से ही कुछ समूह इसकी आलोचना करते रहे।
उन्होंने कहा कि आज भी वंदे मातरम् वही राष्ट्रीय प्रेरणा का स्रोत है, लेकिन अंग्रेजों की औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित लोग और तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले नेता इस गीत का विरोध कर रहे हैं। विहिप का मानना है कि वंदे मातरम् का विरोध राष्ट्रविरोध से कम नहीं है। संगठन ने आह्वान किया कि देशवासी मिलकर इस गीत का गौरव बढ़ाएं और एक सबल, एकीकृत भारत के निर्माण में योगदान दें।

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