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सामाजिक समरसता है समाज में एकता का आधार: डॉ. मोहन भागवत

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता ही समाज की एकता का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म व्यापक मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है और यदि दुनिया में पंथ निरपेक्ष समाज का उदाहरण है तो वह हिन्दू समाज है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने कहा कि जाति, भाषा या पंथ से अधिक महत्वपूर्ण हमारी साझा सांस्कृतिक पहचान है। उन्होंने कहा कि जाति व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो रही है और नई पीढ़ी के व्यवहार में इसका प्रभाव कम दिख रहा है। संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती और सबको सहोदर मानकर कार्य किया जाता है।
उन्होंने परिवार व्यवस्था के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिकता स्वीकार्य है, लेकिन अंधानुकरण नहीं होना चाहिए। बच्चों को पारिवारिक संस्कार और परंपराओं से जोड़ना आवश्यक है। संयुक्त परिवारों के विघटन पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि मजबूत परिवार ही सशक्त समाज की नींव होते हैं। मंदिरों के सरकारी नियंत्रण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मंदिरों का संचालन श्रद्धालुओं और धर्माचार्यों के हाथ में होना चाहिए। इस दिशा में विश्व हिन्दू परिषद सहित कई संस्थाएं प्रयासरत हैं।
उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर मजबूत भूमिका निभाने की क्षमता रखता है और आर्थिक या वैश्विक दबावों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। समाज परिवर्तन के लिए लोगों से सामाजिक गतिविधियों से जुड़ने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान भी किया।

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