वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
वाराणसी। जीवन में यम-नियम का पालन, आचरण की शुद्धता और आत्मसंयम ही कुंडलिनी जागरण का मूल आधार है। नैतिक मूल्यों और अनुशासन के बिना उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों को संभालना संभव नहीं है। यह संदेश जगद्गुरु शंकराचार्य ने शनिवार को साधकों को दिया। उन्होंने साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने वालों को पहले अपने जीवन में संयम और अनुशासन स्थापित करने की सलाह दी।
शंकराचार्य ने कहा कि कुंडलिनी जागरण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले साधकों को यम और नियम को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए। जब आचरण शुद्ध होता है और साधक आत्मनियंत्रण का अभ्यास करता है, तभी आध्यात्मिक साधना की नींव मजबूत होती है। उन्होंने साधकों को जल्दबाजी से बचने और निरंतर अभ्यास पर ध्यान देने का संदेश दिया।
कुंडलिनी शक्ति के जागरण के तीन प्रमुख मार्ग बताते हुए उन्होंने देवी कृपा, गुरु कृपा और साधना के महत्व पर प्रकाश डाला। देवी कृपा को जगदम्बा की अनुकंपा, गुरु कृपा को तत्वदर्शी गुरु के मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद और साधना को साधक के निरंतर, निष्ठापूर्ण प्रयास से जोड़ा। उनके अनुसार, इन तीनों का समन्वय साधना की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
शंकराचार्य ने कहा कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए धैर्य, अनुशासन और आत्मनियंत्रण आवश्यक हैं। साधकों को नैतिक मूल्यों को मजबूत करते हुए साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। शिविर में प्रतिदिन सुबह 4:30 बजे प्रातः मंगलम्, छह बजे साधना शिविर, 8:30 बजे महापूजा एवं नवचंडी पाठ आयोजित हो रहा है। दोपहर दो बजे शिविर का दूसरा सत्र और शाम को विशेष अर्चन किया जा रहा है। यह जानकारी शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने दी।